
बांग्लादेश के संद्विप उपजिले में हाल में कुरान के पाठ का कार्यक्रम आयोजित किया गया था, लेकिन यहां पर जो नारे लगे वो धार्मिक नहीं बल्कि पाकिस्तान के हक में थे. मंच से ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के नारे लगाए जाने के कुछ वीडियो सामने आए, तो ऐसा लगा कि 1971 की तस्वीर जिंदा हो गई है. इस घटना ने पुराने घावों और राजनीतिक आशंकाओं को फिर से हवा दे दी. यह सिर्फ एक घटना नहीं बांग्लादेश के बर्बाद भविष्य को चेताने वाली तस्वीर है. ये दिखाती है कि किस तरह से जमात-ए-इस्लामी का धीरे-धीरे उत्थान हो रहा है और बांग्लादेश में कट्टरपंथ अपनी जड़ें पसार रहा है.
अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त, 2024 में जमात पर लगाई गयी पाबंदी हटने के बाद पार्टी फिर सक्रिय हुई और राजनीतिक रूप से सक्रिय होने लगी. जमात-ए-इस्लामी का इतिहास 1971 की जिहादी और प्रो पाकिस्तान गतिविधियों से जुड़ा हुआ है. उस समय इसके कुछ सदस्यों को राजाकार और अन्य सहयोगी समूहों के रूप में पाकिस्तानी सेना के साथ जोड़ा गया था. 1971 के युद्ध के दौरान इसकी भूमिका पाकिस्तान के हक में और अल्पसंख्यकों के दमन में थी.
